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Articles by "ISLAM"

सिस्टर विक्टोरिया (अब आयशा) की इस्लाम अपनाने की दास्तां बड़ी दिलचस्प है। उनका पहली बार मुसलमान और इस्लाम से सामना 2002 में तब हुआ जब उन्होंने सेना की नौकरी जॉइन की और सऊदी अरब के सैनिकों के सम्पर्क में आई। और फिर उन्होंने साल 2011 में इस्लाम अपना लिया । अपनी जिंदगी में घटित एक दुखद घटना और कुरआन और हदीस (पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. की शिक्षाओं) का अध्ययन के बाद उन्हें अपनी जिंदगी का मकसद इस्लाम में ही नजर आया।

अस्सलामु अलैकुम
मेरा नाम विक्टोरिया एरिंगटोन (अब आयशा) है। मैं जॉर्जिया में पैदा हुई और गैर धार्मिक ईसाइ परिवार में पली-बढ़ी। मैंने गैर धार्मिक इसलिए कहा है क्योंकि हम अक्सर चर्च नहीं जाते थे और मेरे माता-पिता शराबी और स्मोकर थे। मेरे माता-पिता के बीच उस वक्त तलाक हो गया था जब मैं युवा थी। तलाक के बाद मेरी मां ने चार बार विवाह किया। मेरे पिता अक्सर काम के सिलसिले में सफर पर ही रहते थे और वे घर पर कम ही रुकते थे। इन हालात से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मेरी पारिवारिक जिंदगी सामान्य नहीं रही।

ईसाइयत से जुड़े कई सवाल अक्सर मेरे दिमाग में घूमते रहते थे। जैसा कि ईसाइ मानते हैं कि ईसा मसीह पूरे इंसानों के गुनाहों की खातिर सूली पर चढ़े हैं। मैं सवाल उठाती थी अगर हमें ईसा मसीह के सूली पर चढऩे की वजह से पहले ही अपने गुनाहों की माफी मिल गई है तो फिर हमें नेक काम करने की आखिर जरूरत क्यों है? मनाही के बावजूद आखिर हम सुअर का गोश्त क्यों खाते हैं? आखिर एक ही वक्त में ईश्वर, ईश्वर और ईसा कैसे हो सकता है? यानी एक ईश्वर दो रूपों में वह भी एक ही वक्त में! ऐसे कई सवाल अक्सर मेरे जहन में उठते थे। मैं इन सवालों का जवाब चाहती थी लेकिन न परिवारवालों के पास और न ही पादरियों के पास मेरे इन सवालों का जवाब था। मेरे यह सवाल अनुत्तरित ही रहे।

साल 2002 में मैंने सेना की नौकरी जॉइन की और टे्रनिंग के दौरान मैं कई मुस्लिम सऊदी अरब के सैनिकों के सम्पर्क में आई। यह इस्लाम से मेरा पहला परिचय था। हालांकि उस वक्त धर्म को लेकर मैं संजीदा नहीं थी। दरअसल मेरी जिंदगी में एक अहम मोड़ 2010 में आया जब मुझे एक गंभीर पारिवारिक संकट का सामना करना पड़ा क्योंकि मेरे ईसाइ पति ने मुझे तलाक दे दिया था। इसी बीच मेरी मुलाकात एक शख्स से हुई जो मुस्लिम था। मैंने उस मुुस्लिम शख्स की जिंदगी के विभिन्न पहलुओं और गतिविधियों पर गौर किया। उससे इस्लाम से जुड़े कई सवाल पर सवाल किए। उस मुस्लिम शख्स ने मुझ पर कभी भी इस्लाम नहीं थोपा बल्कि मुझसे कहा कि आप फलां-फलां किताबें पढें। उसने मुझो इस्लाम पर कई किताबें और कुरआन दी। मैंने पूरा कुरआन पढ़ डाला और बहुत कुछ बुखारी (इसमें मुहम्मद सल्ल. की शिक्षाएं संकलित हैं।) भी। इस्लाम पर और भी अनगिनत किताबें मैने पढ़ डाली। मैंने अपने हर एक सवाल का जवाब इस्लाम में पाया। मैंने इस्लाम में जिंदगी से जुड़े हर पहलू पर रोशनी पाई। मुझे हर एक मसले का समाधान इस्लाम में नजर आया। अब मैं जान चुकी थी कि यही एकमात्र रास्ता है जो मुझे सिखाता है कि मुझो अपनी जिंदगी किस तरह गुजारनी चाहिए।

मुझे अपने सवालों के जवाब चाहिए थे। मैं एक गाइड बुक चाहती थी जिसके मुताबिक मैं अपनी जिंदगी गुजार सकूं, और आखिर इसी के चलते मैनें दिसम्बर 2011 में इस्लाम अपना लिया।

Sawal:-Hazrat Moosa (Alaihissalam) Ke “Asa” Mubarak Ka Kya Naam Tha?
.
Jawab:-Aap Ke “Asa” Mubarak Ke Nam Se 3 Aqwal Hai…
1.Nab’a.
2.Maasha.
3.Illiq.
Ye Asa Mubarak “Jannat” Ke Darakht (Ped) “Aas” Ki Lakdi Ka Tha.
Ye Asa Mubarak Hazrat Adam (Alaihissalam) Jannat Se Laaye The,Unse Muntaqil Hota Huwa,Hazrat Shoeb (Alaihissalam) Tak Pahuncha,Aur Aap Ne Hazrat Moosa Ko Bakriya’n Charane ke Liye Diya tha.
Is Asa Ki Lambayi Aap Ke Qad ke Barabar Thi.
{Ibn-e Kaseer,Parah-16-Ruku10}

Note: Asa “Lakdi Ke Dande” Ko Kahte Hai,Jis Se Log Sahara Leke Chalte Hai.

*********

Sawal:-Hazrat Moosa (Alaihissalam) Ke Asa Mubarak Me Kya Kya Khubiya Thi?
.
Jawab:-Aap Ke Asa Mubarak Ki Khubiya’n Is Tarah Riwayato Me Mazkoor Hain…
1. Is Asa Mubarak Ke Upar Ki 2 Shakhen Thi,Jo Tareek (Andhere) Me Dono Taraf Jalti Thi.
2.Aap Jab Safar Me Hote To Ye “Asa” Aap Se Baaten Karte Chalta Tha.
3.Aap Ko Jab Bhook Lagti,Aur Koi Cheez Khaane Peene ko Naa Hoti To, Asa Ko Zameen Par Maarte,Usse Ek Din Ka Khana Nikal Aata Tha.
4.Jab Aap Ko Piyas Lagti To Aap Zameen Par Nasab Karte To Usse Paani Ubalna Shuru Ho Jaata Tha.
5.Jab “Kuwe’n” Se Paani Kheechne ki Naubat Aati To Ye Asa Dol Ka Kaam Deta,Aur Itna Lamba Hojata Jitni Kuwen Ki Gaihrayi Hoti,Upar Ki 2 Shaakhe’n Dol Ki Tarah Banjati Thi.
5.Jab Aap Ko “Phal” Khaane Ki Khuwahish Hoti To Us Asa ko Zameen Par Dafan Kardete,Ye Asa Darakht (Ped) Banjaata,Patte Nikal Aate,Fir Phal Aajate The.

6. Jab Koi Dushman Saamne Aata To Ye “Asa” Khud Ba Khud Us se Ladta,Aur Galib Aajata Tha.
{Nuzhatul Majalis,Safa-No.23}


" POST BY MOHSIN "

हजरत अली के घर में सबने रोजा रखा। हजरत फातिमा ने भी रोजा रखा, दो बच्चे है उनके अभी छोटे है पर रोजा रखा हुआ है।मगरिब का वक़्त होने वाला है, इफ्तारी का वक़्त होने वाला है, सबके सब मुसल्ला बिछा कर रो-रोकर दुआ मांगते हैं. हजरत फातिमा दुआ खत्म करके घर में गयी और चार (4) रोटी बनाई, इससे ज्यादा उनके घर में अनाज नही है।

हजरत फातिमा चार रोटी लाती है। पहली रोटी अपने शौहर अली के सामने रख दी, दूसरी रोटी अपने बड़े बेटे हसन के सामने, तीसरी रोटी छोटे बेटे हुसैन के सामने रख दी, ओर एक रोटी खुद रख ली।मस्जिद-ए-नबवी में आजान हो गयी,  सबने रोजा खोला, सबने रोटी खाई मगर दोस्तो #अल्लाह_की_कसम वो फातिमा थी जिसने आधी रोटी खाई ओर आधी रोटी को दुपट्टे से बांधना शुरू कर दिया. ये मामला हजरत अली ने देखा और कहा के फातिमा तुझे भूख नही लगी, एक ही तो रोटी है उसमे से आधी रोटी दुपट्टे में बांध रही हो??

फातिमा ने कहा!! ऐ अली हो सकता है मेरे बाबा जान(नबी पाक)को इफ्तारी में कुछ ना मिला हो, वो बेटी कैसे खायगी जिसके बाप ने कुछ खाया नही होगा? फातिमा दुपट्टे में रोटी बांध कर चल पड़ी है उधर हमारे नबी मगरिब की नमाज़ पढ़ा कर आ रहे हैं हजरत फातिमा दरवाजे पर है देखकर हुजूर कहते हैं ऐ फातिमा तुम दरवाजे पर कैसे, फातिमा ने कहा ए अल्लाह के रसूल मुझे अंदर तो लेके चले।

हजरत फातिमा की आंखों में आंसू थे, कहा जब इफ्तार की रोटी खाई तो आपकी याद आ गयी कि शायद आपने खाया नही होगा इसलिए आधी रोटी दुपट्टे से बांध कर लाई हूँ, रोटी देखकर हमारे नबी की, आंखों में आंसू आ गए और कहा #ए_फातिमा अच्छा किया जो रोटी ले आई वरना चौथी रात भी तेरे बाबा की इसी हालात में निकल जाती। दोनों एक दूसरे को देखकर रोने लगते हैं। अल्लाह के रसूल ने रोटी मांगी, फातिमा ने कहा बाबा जान आज अपने हाथों से रोटी खिलाऊंगी ओर छोटे छोटे टुकड़े किये और हुजूर को खिलाने लगी।

रोटी खत्म हो गयी और हजरत फातिमा रोने लगती है. हुजूर पाक ने देखा और कहा के फातिमा अब क्यों रोती हो? कहा अब्बा जान कल क्या होगा?? कल कोन खिलाने आयगा? कल क्या मेरे घर मे चुहला जलेगा ??कल क्या आपके घर में चुहला जलेगा? नबी ने अपना प्यारा हाथ फातिमा के सर पर रखा और कहा कि फातिमा तू भी सब्र करले ओर मैं भी सब्र करता हूँ। हमारे सब्र से अल्लाह उम्मत के गुनाहगारों के गुनाह माफ करेगा। अल्लाहु अकबर

ये होती है मोहब्बत जो नबी को हमसे थी, उम्मत से थी। ये गुनाहगार उम्मती हम ही है जिनके लिए हमारे नबी भूखे रहे, नबी की बेटी भूखी रही। और आज हमलोग क्या कर रहे हैं. उनके लिए कल कयामत के दिन #मैं_ओर_आप_क्या_जवाब_देंगे।

-आमना Faria सिंधिया

शोधकर्ताओं को एक हस्तलिपि मिली है, जिसमें न केवल कयामत के दिन की भविष्यवाणी की गई है, बल्कि नक्शे के द्वारा इस्लाम के ईसाई धर्म पर हावी होकर दुनियाभर में फैलने की भी भविष्यवाणी है।
यह हस्तलिपि लैटिन भाषा में लिखी गई है। इसमें इस्लाम के विस्तार का जिक्र है। इस हस्तलिपि के लेखक का नाम तो नहीं पता, लेकिन कुछ का कहना है कि किसी बापतिस्ता नाम के एक ज्योतिषीय चिकित्सक ने इसे लिखा है। यह हस्तलिपि जर्मनी के लूबक प्रांत में 1486 से 1488 के बीच लिखी गई। फिलहाल यह कैलिफॉर्निया के हंगटिंगटन पुस्तकालय में रखी हुई है।

हस्तलिपि में भविष्यवाणी की शुरुआत एक मानचित्र से हुई है। इसमें 639 से 1514 के बीच की दुनिया को उकेरा गया है। लेखक ने दुनियाभर में इस्लाम के फैलने और इस्लाम द्वारा दुनिया पर कब्जा किए जाने की चेतावनी देते इसे ईसाई देशों के लिए खतरा बताया है।

जाने-माने लेखक वेन डोजर ने इस हस्तलिपि को ‘इस्लाम विरोधी’ बताते हुए कहा, ‘यह दुखद है, लेकिन उस समय उन जगहों में इस्लाम को लेकर बड़े स्तर पर पूर्वाग्रह कायम था।’

इसी हस्तलिपि में आगे लिखा है कि ‘इस्लाम की तलवार’ पहले यूरोप पर कब्जा करेगी और फिर वहां से बाकी दुनिया में अपना रास्ता बनाएगी। इस नक्शे में बीच में धरती की जगह एक घेरा बना है।

इसके अंदर 5 तलवारें उकेरी गई हैं। 5 में से एक तलवार पर लिखा है, ‘यह सही करती है।’ दूसरी तलवार पर लिखा है, ‘सुधारती है।’ तीसरी तलवार पर ‘कुचलती है’ लिखा है। चौथी तलवार पर ‘घूमती है’ लिखा है। पांचवीं तलवार पर कुछ नहीं लिखा। इन आकृतियों के आसपास यह भविष्यवाणी की गई है कि 1515 से 1570 के बीच दुनिया भर में क्या-क्या घटेगा।

इस्लाम के फैलने के अलावा एक अलग नक्शे में ईसा मसीह के विरोधी के उदय को दर्शाया गया है। तस्वीरों के माध्यम से दिखाया गया है कि ईसा के विरोधी की बड़ी सींगे दुनिया भर में फैल गई हैं। इसमें दर्शाय गया है कि वह धोखे, चालाकी, क्रूरता से और खुद को भगवान बताकर लोगों को उसे मानने के लिए राजी करेगा। इसके बाद उस दौर को भी दर्शाया गया है कि जब फिर से दुनिया में ईसा का झंडा लहराएगा। इस नक्शे में धरती और नर्क की परिधि की गणना भी की गई है। बताया गया है कि नर्क 8,000- 6,100 मील लंबा-चौड़ा है।

हज़रत मुहम्मद सल्ल. एक परिचय।
न किसी काले को किसी गोरे पर, न किसी गोरे को किसी काले पर कोई बढोत्तरी हासिल हे । सब आदम की सन्तान हैँ और इन्सान होने की हेसियत से सब बराबर हैं ।

मानव समानता के यह महान विचार समस्त मानवजाति के लिए ईश्वर के अन्तिम ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के है, जिनका जन्म 571 ई॰ में अरब के प्रसिद्ध शहर मक्का मेँ हुआ था और 40 वर्ष की आयु में अल्लाह ने जिनको अपना नबी (प्रेषित, पैगंबर) बनाया और अपनी पवित्र वाणी कुरआन वह्रय (प्रकाशना) के माध्यम से आप पर अवतरित की ।

 अल्लाह की आज्ञानुसार 23 वर्ष तक आपने लोगों को सत्य धर्म की ओर बुलाया और अल्लाह का संदेश सुनाया और सन् 632 इं० में अपने मिशन के पूर्ण होने के पश्चात वापस ईश्वर से जा मिले । वर्तमान विश्व की 25 प्रतिशत जनसंख्या आपको अपना आदर्श और मार्गदर्शक स्वीकार करके आपका अनुसरण करने का प्रयत्न कर रही है और लोक परलोक में सुख शांति मुक्ति और समाधान प्राप्त करने का प्रयत्न कर रही है, आपके अनुयायियों की संख्या में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती जा रही हे ।
आपका भी स्वागत रहेगा।

एक मर्तबा हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ को किसी ने सवाल किया
कब तक हम कमज़ोरों को दावत देते रहोगे.... मक्का का जो पहलवान है उसको दावत क्यों नही देते.....?

मक्का का पहलवान जिनका नाम था हज़रत रुकाना बहुत जबरदस्त पहलवान था...! रुकाना के बारे में लिखा है वह इतने ज़बरदस्त पहलवान थे अगर एक जगह बैठ जाते तो 40 आदमी मिल कर भी उनको उठा नही सकते थे। किसी ने आकर कहा कब तक हम कमज़ोरों को दावत देते रहोगे अगर आप पैगम्बर इस्लाम हैं आप का दिन सच्चा है अगर आप नबी है तो रुकाना को जा कर दावत दो ....!

हमारे नबी ए करीम मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ मक्का में रुकाना के दरवाज़े पर गए दरवाज़ा खटखटाया अंदर से रुकाना ने पूछा कौन......! आप ﷺ ने फरमाया मै मुहम्मद मै अल्लाह का रसूल हुँ। एक बार कलमा पढ़ले तू कामयाब हो जाएगा ...! वह तो पहलवान बोला कलमा पढू. ...? ना ना कलमा नही पढूंगा मैं तो अपनी ताकत के बलबूते पर जीता हुँ मैं कलमा नही पढूंगा। नबी ने बहुत समझाया तो रुकाना बोला अगर तुम नबी हो तो कुश्ती का एक मुक़ाबला हो जाये। अगर मैं तुझे पछाड़ दूँ तो तू मेरी तरह बन जाना अगर तू मुझे पछाड दे तो मैं कलमा पढ़ लूँगा...!

आप मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ ने फरमाया मुझे यह भी मंज़ूर है। इस बहाने कम अज़ कम मेरा उम्मती जहन्नम से आज़ाद तो हो जाएगा। जब रुकाना ने देखा अच्छा मैं मक्का का पहलवान और यह मुझे चैलेंज दे रहा तो रुकाना ने कहा अभी नही अभी नही अब तो मैदान में मुक़ाबला होगा और सारे लोग जमा होंगे। चुनांचे ऐलान हुआ सारा मक्का जमा हो गया पूरा मैदान खचाखच भर गया। आप मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ ने रुकाना से कहा ए रुकाना अब यह मुक़ाबला शुरू होगा ... रुकाना ने कहा मुक़ाबला तो करेंगे पहले यह बताओ आप मुझपे पहले हमला करेंगे या पहले मैं हमला करूँगा....

नबीए करीम मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की आंखों में आंसू आ गए फ़रमाया ना मैं तुझ-पे हमला नही करूँगा, कोई नबी अपने उम्मती पे हमला नही किया करता... [सुब्हान अल्लाह] इस लिए तू मुझपे हमला करले मैं उसके लिए तैयार हूं ...!

अब वह रुकाना तो रुकाना पहलवान थे सारा मक्का उनके साँथ मे था सारे मर्द और सारी औरतो ने उसके नाम की आवाजे लगाई वो रुकाना दौड़ता दौड़ता आया करीब था के हमारे नबी-ए-करीम पर हमला करता..!! जैसे ही उछला नबी ने रहमत वाले हाँथों को फैला दिया वह उछल कर नबी ए करीम मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की गौद में आ गया.. हमारे नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ ने बड़े मुहब्बत से उसे ज़मीन पर रखा... ले रुकाना तू हार गया और में जीत गया..

वह रुकाना चकरा गया के यह क्या हुआ अचानक रुकाना कहता है.. ऐ-मुहम्मद यह मेरी समझ मे नही आया मुझको एक और चांस दे-दो ना इसलिए के मैने हज़ारो कुश्तिया लड़ी लेकिन :- ऐसी कुश्ती तो मैने आज तक नही लड़ी .....
नबी ए करीम मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ ने फरमाया
रुकाना जा तुझे दूसरा मौका भी देता हूं ..

हज़रत रुकाना फिर दौड़ते-दौड़ते आये
फिर उछले नबी ने रहमत वाले हाँथों को फिर से फैलाया रुकाना उछल के गौद में आ गए हमारे नबी-ए-करीम ﷺ ने फिर से मुहब्बत से ज़मीन पर रख दिया। और फ़रमाया रुकाना तू फिर हार गया में जीत गया ..!
रुकाना ने फिर कहा नही समझ के सब बाहर है एक और चांस आखरी चांस।

जब तीसरी बार हज़रत रुकाना आये हमारे नबी ए करीम मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ ने इसी तरह अपने मुबारक हाँथो को रखा रुकाना उछले और उछलने के बाद नबी की गोद में, नबी ने बड़े मुहब्बत से ज़मीन पर रखा। हज़रत रुकाना को ज़मीन पर रखना था रुकाना ने ऐलान फ़रमाया. अब सारा मक्का रुकाना को कहने लगा. नाम डूबा दिया मिट्टी में मिला दिया. कलमा पढ़ लिया तूने तू मक्के का पहलवान तू मक्के का जांबाज़ तू मक्के का इतना बहादुर और तूने कलमा पढ़ लिया।

हज़रत रुकाना ने फरमाया ए मक्का वालो मैने कलमा इस लिए नही पढ़ा के में कुश्ती में तीन बार हार गया, मैने तो इसलिए कलमा पढ़ा के बहुत कुश्तिया लड़ा हु बड़े बड़े मैदानों में गया हूं लेकिन:- हमारा यह दस्तूर है. जब सामने वाला कंट्रोल करता है तो ज़ोर से ज़मीन पे पटकता है ... मैं तीन मर्तबा नबी के कंट्रोल में आया वह चाहते तो मुझे ज़ोर से ज़मीन पे पटकते लेकिन:- अल्लाह की कसम वह मुझे ऐसे ज़मीन पर रखते थे जैसे कोई शफ़क़त करने वाली माँ अपने दूध पीते बच्चे को ज़मीन पे रखती है। ए मक्का वालो तुम्हे क्या मालूम जब में पहली मर्तबा दौड़ा था उनके चेहरे से वो नूर उठ रहा था जो आसमान की तरफ जा रहा था मैं उसी वक़्त समझ गया यह किसी मामूली इंसान का चेहरा नही यह तो नबूवत वाला चेहरा है उसी वक़्त मेरे दिल ने कहा यह झूठा नही हो सकता यह तो नबी के सिवा और कुछ नही हो सकता....

बसरा में एक इंतिहाई हसीनो जमील औरत रहा करती थी- लोग उसे शअवाना के नाम से जानते थे- ज़ाहिरी हुस्नो जमाल के साथ साथ उसकी आवाज़ भी बहुत खूबसूरत थी- अपनी खूबसूरत आवाज़ की वजह से वो गायकी और नोहा गरी में मशहूर थी- बसरा शहर में खुशी और गमी की कोई मजलिस उसके बगैर अधूरी तसव्वुर की जाती थी- यही वजह थी कि उसके पास बहुत सा मालो दौलत जमा हो गया था- बसरा शहर में फिस्को फुजूर के हवाले से उसकी मिसाल दी जाती थी- उसका रहन सहन अमीराना था,वो बेशक़ीमती लिबास ‌ज़ेबतन करती और ज़ेवरात से बनी संवरी रहती थी-
एक दिन वो अपनी रूमी और तुर्की कनीज़ों के साथ कहीं जा रही थी- रास्ते में उसका गुज़र हज़रत सालेहुल मिरी علیہ الرحمہ के घर के क़रीब से हुआ-

आप अल्लाह ﷻ के बरगज़ीदा बंदों में से थे- आप बा अमल आलिमे दीन और आबिदो ज़ाहिद थे- आप अपने घर में लोगों को वअज़ इरशाद फ़रमाया करते थे- आपके वअज़ की तासीर से लोगों पर रिक़्क़त तारी हो जाती और वो बड़ी ज़ोर ज़ोर से आहो बका शुरू कर देते और अल्लाह ﷻ के खौफ से उनकी आंखों से आंसूओं की झड़ियां लग जातीं- जब शअवाना नामी वो औरत वहां से गुज़रने लगी तो उसने घर से आहो फुगां की आवाज़ें सुनीं- आवाज़ें सुनकर उसे बहुत गुस्सा आया- वो अपनी कनीज़ों से कहने लगी:
"ताज्जुब की बात है कि यहां नोहा किया जा रहा है और मुझे इसकी खबर तक नहीं दी गई-"
फिर उसने एक खादिमा को घर के हालात मालूम करने के लिए अंदर भेज दिया- वो लौंडी अंदर गई और अंदर के हालात देखकर उस पर भी अल्लाह ﷻ का खौफ तारी हो गया और वो वहीं बैठ गई- जब वो वापस ना आई तो शअवाना ने काफी इंतज़ार के बाद दूसरी और फिर तीसरी लौंडी को अंदर भेजा मगर वो भी वापस ना लौटी- फिर उसने चौथी खादिमा को अंदर भेजा जो थोड़ी देर बाद वापस लौट आई और उसने बताया कि:
"घर में किसी के मरने पर मातम नहीं हो रहा बल्कि अपने गुनाहों पर आहो बका की जा रही है,लोग अपने गुनाहों की वजह से अल्लाह ﷻ के खौफ से रो रहे हैं-"

शअवाना ने ये सुना तो हंस दी और उनका मज़ाक़ उड़ाने की नियत से घर के अंदर दाखिल हो गई- लेकिन क़ुदरत को कुछ और ही मंज़ूर था- ज्यूं ही वो अंदर दाखिल हुई अल्लाह ﷻ ने उसके दिल को फेर दिया- जब उसने हज़रत सालेहुल मिरी علیہ الرحمہ को देखा तो दिल में कहने लगी:
"अफसोस ! मेरी तो सारी उम्र ज़ाया हो गई, मैंने अनमोल ज़िंदगी गुनाहों में अकारत कर दी,वो मेरे गुनाहों को क्यूंकर मुआफ फरमाएगा?"
इन्ही ख्यालात से परेशान होकर उसने हज़रत सालेहुल मिरी علیہ الرحمہ से पूछा:
"अय इमामुल मुस्लिमीन ! क्या अल्लाह ﷻ नाफरमानों और सरकशों के गुनाह भी मुआफ फरमा देता है?"
आपने फ़रमाया:
"हां ! ये वअज़ो नसीहत और वादे वईदें सब उन्ही के लिए तो हैं ताकि वो सीधे रास्ते पर आ जाएं-"
इस पर भी उसकी तसल्ली ना हुई तो वो कहने लगी:
" मेरे गुनाह तो आसमान के सितारों और समंदर के झाग से भी ज़्यादा हैं-"
आपने फ़रमाया:
"कोई बात नहीं ! अगर तेरे गुनाह शअवाना से भी ज़्यादा हों तो भी अल्लाह ﷻ मुआफ फरमा देगा-"
ये सुनकर वो चीख पड़ी और रोना शुरू कर दिया और इतना रोई कि उस पर बेहोशी तारी हो गई-

थोड़ी देर बाद जब उसे होश आया तो कहने लगी:
"हज़रत ! मैं ही वो शअवाना हूं जिसके गुनाहों की मिसालें दी जाती हैं-"
फिर उसने अपना क़ीमती लिबास और गिरां क़द्र ज़ेवर उतार कर पुराना सा लिबास पहन लिया और गुनाहों से कमाया हुआ सारा माल गुरबा में तक़सीम कर दिया और अपने तमाम गुलाम और खादिमाएं भी आज़ाद कर दीं-
फिर अपने घर में मुक़ीद होकर बैठ गई- उसके बाद वो शबो रोज़ अल्लाह ﷻ की इबादत में मसरूफ रहती और अपने गुनाहों पर रोती रहती और उनकी मुआफी मांगती रहती- रो रोकर रब ﷻ की बारगाह में इल्तिजा करती:
"अय तौबा करने वालों को महबूब रखने वाले और गुनाहगारों को मुआफ फरमाने वाले ! मुझ पर रहम फरमा, मैं कमज़ोर हूं तेरे अज़ाब की सख्तियों को बर्दाश्त नहीं कर सकती,तू मुझे अपने अज़ाब से बचा ले और मुझे अपनी ज़ियारत से मुशर्रफ फरमा-"
उसने इसी हालत में चालीस साल ज़िंदगी बसर की और इंतिक़ाल कर गई..!!!

टाइम्स ऑफ़ इस्लाम
आज जो औरते मोर्डेन सोसाइटी में रहती है और मोर्डेन ज़माने के हिसाब से बुर्के, हिजाब का विरोध करती है, वो जरा आँख खोल कर इस पोस्ट को पढ़े और सोचें की बिना बुर्के की आज़ादी तुम लोगो को जहन्नम के सिवा कुछ न देगी | आज की लड़कियां, औरतो में तरह तरह की बुराईया जन्म ले चुकी है जिस की सब से बड़ी वजह दीन की तालीम से दुरी है | इसके अलावा टीवी फिल्में देखने का आम चलन, औरतो और लड़कियो का बेपर्दा सज धज के सड़को पर खुले आम घूमना ये इस्लाम की तालीम नही है | ये मोर्डेन जमाना तुमको तबाह कर देगा और जो लड़की या औरत हिजाब में रहती है उसको ये मोर्डेन ज़माने की लडकिया बहेन जी समझती है |

और कुछ औरते ऐसा तंग (fit) बुर्का पहते है जिस्से जिस्म कि बनावट नज़र आती है , आखिर बुर्के मे यह फैशन कहां से ले आये? देखो बेपर्दा और मोर्डेन ज़माने की सोच रखनी वाली लड़कियों और औरतों क़ुरआन पाक और हदीस शरीफ में क्या हुक्म है तुम लोगो के लिए !
 
रब तआला इर्शाद फरमाता है...
मुसलमान औरतो को हुक्म दो अपनी निगाहे कुछ नीची रखे, और पारसाई की हिफाज़त करे और अपने शरीर की जिस्म की बनावट न दिखाए, मगर जो खुद ही जाहिर है और दुप्पटा अपने गिरेबानो पर डाले रहे और अपना सिंगार जाहिर न करे ! अपने शौहरों पर जाहिर कर सकते है l
[हवाला : कन्जुल ईमान , पारा 18 , सूरह नूर, आयत 31]

इस आयते करीमा में अल्लाह ने साफ़ साफ़ हुक्म दिया है की अपनी निगाहे नीची रखे, अपना बनाव सिंगार अपने शौहर के लिए ही करे। गैर मर्दों के लिए नही, अपने सीने और सर पर दुपट्टे डाले रहे !
लेकिन आज मामला ही उल्टा नज़र आ रहा है अक्सर औरते घर में नोरमल रहेंगी लेकिन बाहर निकलना होता है तो खूब बन संवर कर निकलती है गोया गन्दगी उनके शौहर के लिए और सिंगार गैर मर्दों के लिए |
 
नोट:* गलती सिर्फ उन औरतों कि नही है,गलती उनके मां-बाप ,शोहर और भाई कि है,जो यह सब देखकर भी उन्हे नही रोकते ,क्या हो गया है तुम्हारी गैरत को शर्म आती तुमको नही,याद रखो बरोज़ महशर तुमसे इसकी पूछ होगी तब क्या कहोगे? अब भी वक्त है अपने माहौल को सुधारो|
पोस्ट का मतलब सिर्फ इस्लाह है किसी का दिल दुखाना नही है

टाइम्स ऑफ़ इस्लाम
हामिला औरत को चाहिए कि हमेशा खुश रहे, रोज़ाना ग़ुस्ल करे,पाक साफ कपड़े पहने,ग़िज़ा हलकी मगर मुक़व्वी खाये,खूबसूरत तस्वीरें देखें, बे वक़्त खाने पीने या सोने जागने से परहेज़ करे, फलों का इस्तेमाल ज़्यादा करे खासकर संगतरा कि संगतरा खाने से बच्चा खूबसूरत होगा, नमाज़ पढ़ना ना छोड़े और क़ुरान की तिलावत करती रहे खुसूसन सूरह मरियम की,अगर चाहते हैं कि आपका बच्चा आपका फरमाबरदार रहे तो सबसे पहले आपको नेक बनना पड़ेगा क्या सुना नहीं कि हुज़ूर ग़ौसे पाक रज़ियल्लाहु तआला अन्हु मां के पेट में ही 18 पारे के हाफिज़ हो गए थे मतलब साफ है आप जो भी करेंगे उसका सीधा असर आपके बच्चे पर पड़ेगा लिहाज़ा झूट चुग़ली बदनज़री गाना बजाना गाली गलौच हराम ग़िज़ा से परहेज़ी और तमाम मुंकिराते शरइया से बचें

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ये तहरीर पढ़ने वाली तमाम बहनो से मेरी एक अपील है, ये बाते अपने पल्लू से बांध लें.. तमाम बहन, ये मान लें कि आपके भाई, आपके वालिद, वह वाहिद मर्द जात हैं जो आपकी एक जरा सी तकलीफ पर तिलमिला उठते हैं। उनकी इज्जत करों और तुम उनका गुरुर, मान, अभिमान हो उनका सम्मान करो। ना कोई आपको आपके भाई से ज़्यादा महफूज रख सकता है और ना ही कोई आपके बाप से ज्यादा मुहब्बत कर सकता है।

बाकि आप सिर्फ सर पर से दुपट्टा उतारोगी, जमाना आपके तन पर पहना हर कपड़ा नोच निकालने के लिए तैयार बैठा है। ये सोशल मीडिया पर बैठे मीठे शैतान और जिन्नात आपकी सोच को निचोड़ खाने के लिए हरदम तैयार बैठे हैं। जो फेसबुक और वाट्सअप पर आपसे मीठी-मीठी बाते करके उल्लू बनाते हैं, वो भी सिर्फ मौके की तलाश में रहते हैं। इस मतलबी दुनिया में कोई मर्द किसी भी लड़की से सिर्फ एक ही ख़्वाहिश रखता है, उसके तन की,, सिर्फ एक भाई और आपके वालिद ही है, जो हर वक्त आपकी इज्जत की फिक्र करते हैं।

तुम्हें भी वास्ता है दीन का, भाई और बाप की इज्जत को पार्क और होटल पर नीलाम न करो। सिर्फ आप एक बात को ध्यान में रखे जब तुम किसी लड़के के साथ पार्क, होटल, मॉल, सिनेमा में जाती हो तो अपने वालिद और भाई की इज्जत को तार-तार करती हो। आज के आशिको के चक्कर में हजारो बहन-बेटियाँ अपनी जिंदगी खराब कर बैठी हैं। बाकि कभी कोठों पर बैठी तवायफों की कहानियां सुन लेना, वह भी झूठी मुहब्बत का शिकार होकर यहाँ तक पहुँची है।

हर कोठे की असलीयत, आपको ये मिलेंगी, जो मां-बाप के जबर से बचने के लिए महबूब की पनाह में जाने के लिए घर से निकलीं थीं और अब किसी की भी पनाह के काबिल नहीं रहीं। लड़के शादी करने के बाद, आपके जिस्म को दोस्तों के हवाले करते है, फिर शुरु होता है, हाई प्रोफाइल बिजनेस, इससे निकलना नामुमकिन है, आप अय्याशी का खिलौना बन जाओगी, फिर कहाँ फरीयाद करोगी।
-Sifa Arzoo

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